बाकी है

कोई बीती बात रह गई है,
जो अभी भी करनी बाकी है।

नहीं लग रहा दिलचस्प ज़माना अब,
लेकिन तेरे आने की एक आस बाकी है ।

छपती रहती है खबर हर दिन नई अखबारों में,
मगर तुझसे तेरी खबर पूछनी बाकी है।

क्या रखा है इन अल्फाज़ की उलझनों में,
अभी तो तेरी खामोशी की अंताक्षरी सुननी बाकी है ।

भरता हूं रोज़ शाम एक जाम गुमनामी के नाम,
मगर तेरे हाथ की बनी चाय पीनी बाकी है।

शायद मर तो चुके है जस्बात मेरे,
मगर ज़िंदा यादों को दफनानी बाकी है ।

बन गई है ज़िंदगी बदलता हुआ कैलेंडर मगर उसमे,
मौत की तारीख आनी बाकी है।।

बहुत दिनों बाद मुझे, तेरी याद आई है

बहुत दिनों बाद मुझे,तेरी याद आई है।
वो एक परी थी,जिसमे मेरी परछाई है।

मैं इस एक डर से,कोई ख्वाब नहीं देखता।
कि वो शख़्स अब मेरा नहीं,जो अब पराई है।

बुझ चूका हूँ मैं ये मुझे खुद भी पता नहीं।
मेरे वजूद के अंदर,उसकी धुंध ही छाई है।

बरसात के दिनों में वो,अब स्कुल नहीं आती।
जहाँ मैंने प्यार की पहली,मसाल जलाई है।

न जाने कितनी कोशिश की घर जाने की।
इसबार उसके घर जाने की,कसम खाई है।

परिंदो की तरह तो उड़ के जा नहीं सकता।
क़लम उठा कर तेरे लिए ये ग़ज़ल बनाई है।

छू लो आसमान

तू अपनी खुशबू को तो पहचान
इश्क़ है एक दिल का मेहमान

दिल की बातें सुन मायुस न हो
तेरे बिना ये जीवन है मेरी वीरान

मुसाफिर नहीं मंजिल हूँ उसका
अपने दिल की एहमियत तू जान

आँखे बंद कर खुद से पूछ सवाल
दिल में बसता है सदाबहार उद्यान

अपनी जिंदगी जरा सा निखार लो
फिर पंख लगा के छू लो आसमान

रतजगा

हमदर्दी दिखा कर अब मेरा तमाशा न बनाया करो
मुद्दत बाद खुद को मिला हूँ हक़ न जताया करो

देखो वो मैं बादल नहीं जो कही भी बरस जाऊंगा
बार बार सॉरी का मैसेज कर मुझे न सताया करो

मैं सागर हूँ मैं आसमान हूँ कोई नदी का बवंडर नहीं
अपने हाथो में पतवार लिए अब मुझे न बहलाया करो

मेरा सफर है और मेरे बेचैन दिल का अधूरा धोखा है
बेवफा का वो घिनौना इल्जाम मुझपे न लगाया करो

हालात बयान न करूँगा फिर जैसे भी जीये या मरुँ मैं
घुटन भरी रातो में फिर से मुझसे रतजगा न कराया करो

यक़ीन

मेरे दिमाग की मौत तुम्हे सोचते -सोचते ही हो सकती है.
कभी भी हत्याएँ और आत्महत्याएं में यही तो महिम अंतर है.
मेरे कमीज के ऊपर कोई टुटा हुआ बटन नहीं लगा सकती.
तुम यक़ीन न करना मैं शाम को जल्दी घर पहुँच घुमाने या पिक्चर
दिखाने किसी को लेकर जा सकता हूँ.
तुम यक़ीन न करना मैं सड़क पे किसी का हाथ पकड़ कर नहीं चलूँगा.
तुम यकीन न करना मैं किसी को शरद की रातों में जगा रात भर बातें करूँगा
मेरी रातें तुम्हारे नाम बहुत पहले ही कर चूका हूँ ,
मेरे कमज़ोर वक्त पे तुम हमेशा साथ रहोगी .
अनगिनत बार खुद को खत्म होने के कग़ार पर छोड़ तुम्हारा इन्तिज़ार करता रहूँगा,
की तुम आओ और तुम मेरी आत्मा के पास रुको फिर मुझे ऐसे नींद देना जिसमे किसी तिनके का भी दबाव न हो.

ऐसी नींद,
जैसे मरे हुए शरीर को मिलती है.

अब मेरी वो कोई आवाज नही

एकेली खामोश रात ही तो है,कोई अज़ाब नही
गम से हारा हूँ भूलने वाला कोई हिसाब नहीं

सोने नही देती तेरी गुमराहियों की नाकामी मुझें
जिसे पीकर बहक जाये मैं वो कोई शराब नही

तेरी खुशियों को ही अपनी खुशियां मानी थी मगर
मेरे हिस्से में खुशियां आये ऐसी कोई किताब नही

आखरी दम तक तेरी यादों के साये में जीना है
ये जन्मों की दास्ताँ ए हिज्र है महज कोई ख़्वाब नही

मैं पहले की तरह हुस्न पे मुतमईन हुआ बैठा था
मेरे चेहरे पर दर्द का लगा कोई नक़ाब नही

आख़िरकार ये जिंदगी मौत के मानिंद ही तो है
बेसुमार दर्द देने के बाद, गम कोई बेहिसाब नही

हमारे इश्क़ के जुनून में बिखर कर मरूँगा मैं भी
मेरे दर्द का अब किसी के पास कोई जवाब नहीं

कटेगी तमाम उम्र एक खुशी के इंतिजार में मगर
शाम फिर ढल गयी मेरे पास कोई आफताब नही

ये तमन्नाएं बेसब्र है चैन से सोने नही देती मुझे
हम साया गोद में दम तोड़ दे ये कोई मजाक नही

सब से हँस के बात करने पे सब समझतें कि खुश हूं
दिल को साद कर दे अब मेरी वो कोई आवाज नही

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ये प्यार का रिश्ता मैं निभाता रहूँगा

रूठती तुम रहोगी मैं मनाता रहूँगा
ये प्यार का रिश्ता मैं निभाता रहूँगा

तेरी ख्वाहिशों में सांसे तेज हो जायेंगी
तेरे सज़दे में सर हाँ मैं झुकाता रहूँगा

तू जुड़ा मुझसे सांसो की जुम्बिश तलक
तेरी चाहत में अपनी जाँ मैं लुटाता रहूँगा

तेरे दम पर ही मैं फरेबी दुनिया से लडूंगा
जर्रे -जर्रे को मैं इश्क़ सा महकाता रहूँगा

शाम होते ही यादो की दांस्तां इक सी खुले
मुसाफ़िर सा यादो में सदियाँ मिटाता रहूँगा

ये हिन्द की दहाड़ है

हम कभी रुके नहीं
हम कभी झुके नहीं
ये हिन्द की दहाड़ है
रास्तें कभी पूछे नहीं

हर व्यक्ति में एक परवाज़ है
हिन्द के प्रति एक आवाज़ है
ये हिन्द की दहाड़ है
सांसे कभी छूटे नहीं

देश बदलने का एक इतिहास है
हम झुके नहीं कभी ये विश्वास है
ये हिन्द की दहाड़ है
रास्तें कभी कटे नहीं

मुहब्बत के पयम्बर को कभी घर दिया
वेदमंत्र और आजान से कभी भर दिया
ये हिन्द की दहाड़ है
सपने कभी टूटे नहीं

याचक को कभी आशीष मिला
प्यासे को कभी पानी मिला
ये हिन्द की आन बान शान है
ये हिन्द की दहाड़ है
सरे कटे पर कभी झुके नहीं

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वो_मुस्कुराएं_जाते_है

मुझ से मिल कर वो मुस्कुराएं जाते है
अपने कदमों से घर महकाएं जाते है
मेरे पल-पल खबर रहती है उनकों
हमारे इश्क़ के फ़साने गुनगुनाएं जाते है

अधूरी मुलाक़ातों का ज़िक्र करती रहती है
मेरे उदासीयों में अपना इश्क़ फहलाए जाते है
मेरे ज़िंदगी कामयाब हो इसलिए मन्नतें मांगती है
अपनी मिन्नतों से मन्दिरो में नारियल चढ़ाएं जाते है

दो दिलों को अहसास में बांध के रखती है वो
हमारे इश्क़ की दुनिया को सब से छुपाएं जाते है
अपने कातिल निगाहों से निहारा करती है वो
गीले शिक़वे एक एक कर के वो मिटाएं जाते है